पश्चिमी सिंहभूम की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदहाल, सरकार और जनप्रतिनिधि जिम्मेदार : भूषण पाट पिंगुआ
भाजपा नेता सह पूर्व प्रत्याशी भूषण पाट पिंगुवा नें विधायक निरल पूर्ति पर किया हमला
santosh verma
Chaibasa ः भारतीय जनता पार्टी पश्चिमी सिंहभूम जिला महामंत्री भूषण पाट पिंगुआ ने जिले की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को लेकर झारखंड सरकार, शिक्षा विभाग तथा जिले के जनप्रतिनिधियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी सिंहभूम में शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है, लेकिन सरकार और जनप्रतिनिधि केवल बड़े-बड़े दावे और घोषणाएं करने में लगे हैं।
उन्होंने कहा कि जिले में कुल 171 हाई स्कूल हैं, जिनमें 59 स्कूल पूरी तरह शिक्षक-विहीन हैं। लगभग 3420 विद्यार्थी बिना शिक्षक के पढ़ाई करने को मजबूर हैं। कई स्कूलों में हिंदी के शिक्षक गणित पढ़ा रहे हैं, तो कहीं विज्ञान की पढ़ाई बिना विषय विशेषज्ञ के हो रही है। प्लस टू विद्यालयों की स्थिति और भी भयावह है। सरकार ने इंटर स्तर तक स्कूलों को अपग्रेड तो कर दिया, लेकिन अलग से शिक्षक नियुक्त नहीं किए। 9वीं-10वीं के शिक्षक ही 11वीं-12वीं की कक्षाएं चला रहे हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और परीक्षा परिणाम लगातार प्रभावित हो रहे हैं।
भूषण पाट पिंगुआ ने कहा कि एक ओर सरकार शिक्षा सुधार का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर लगातार स्कूलों की संख्या घटाने और स्कूल मर्जर की नीति लागू करने में लगी है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के छोटे स्कूलों को बंद कर दूरस्थ विद्यालयों में जोड़ने की तैयारी की जा रही है, जिससे गरीब परिवारों के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी। छोटे बच्चों को कई किलोमीटर दूर भेजना व्यावहारिक नहीं है और इससे ड्रॉपआउट की संख्या बढ़ सकती है।
उन्होंने हाल ही में बीच सत्र में किताब और कोर्स बदलने के फैसले को भी दुर्भाग्यपूर्ण बताया। अभिभावकों ने एक महीने पहले ही बच्चों के लिए किताबें खरीद ली थीं, लेकिन अचानक पाठ्यक्रम बदलकर सरकार ने गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल दिया। यह शिक्षा विभाग की अव्यवस्था और असंवेदनशीलता का उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि जिले में चल रहे चारों एक्सीलेंस स्कूल भी अव्यवस्था और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। कहीं शिक्षकों की कमी है, तो कहीं प्रयोगशाला, लाइब्रेरी, छात्रावास और मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। सरकार केवल नाम बदलकर और बोर्ड लगाकर शिक्षा सुधार का ढिंढोरा पीट रही है।
उन्होंने जिले के पांचों विधायकों और सांसद पर भी निशाना साधते हुए कहा कि शिक्षा जैसे गंभीर विषय पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी दुर्भाग्यपूर्ण है। हाल ही में मझगांव विधायक ने क्षेत्र को “शिक्षा का हब” बनाने की बात कही थी। विधायक जी पहले यह बताएं कि बिना शिक्षक, बिना संसाधन और बिना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के आखिर किस प्रकार का हब बनाया जाएगा? आज की स्थिति साफ बताती है कि यहां के जनप्रतिनिधियों को शिक्षा से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं है।
उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी और ग्रामीण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से दूर रखकर केवल राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। यदि बच्चे शिक्षित और जागरूक होंगे, तो सरकार की विफलताओं पर सवाल पूछेंगे। झारखंड सरकार को अविलंब शिक्षक नियुक्ति, स्कूलों में आधारभूत सुविधाएं और स्थायी शिक्षा नीति लागू करनी चाहिए, अन्यथा आने वाले समय में छात्र-युवा सड़क पर उतरने को मजबूर होंगे।
