चाईबासा सदर अस्पताल में 5 बच्चों को HIV संक्रमित खून चढ़ाने के मामले में पूर्व सिविल सर्जन व ब्लड बैंक प्रभारी की जमानत रद

 चाईबासा सदर अस्पताल में 5 बच्चों को HIV संक्रमित खून चढ़ाने के मामले में पूर्व सिविल सर्जन व ब्लड बैंक प्रभारी की जमानत रद



डॉ. सुशांतो कुमार माझी और ब्लड बैंक के पूर्व प्रभारी डॉ. दिनेश सवैया की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है

पांच थैलेसीमिया बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ा था

मामले में ब्लड बैंक तकनीशियन पहले से हैं जेल में

santosh verma

Chaibasa  ः पश्चिमी सिंहभूम जिले के सदर अस्पताल में थैलेसीमिया पीड़ित पांच बच्चों को एचआईवी (HIV) संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने के बेहद संवेदनशील मामले में शनिवार को एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) की अदालत ने जिले के पूर्व सिविल सर्जन डॉ. सुशांतो कुमार माझी और ब्लड बैंक के पूर्व प्रभारी डॉ. दिनेश सवैया की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। गौरतलब है कि इस मामले में ब्लड बैंक के पूर्व तकनीशियन मनोज कुमार पहले से ही न्यायिक हिरासत के तहत जेल में बंद हैं।

अक्टूबर 2025 में हुआ था मामले का पर्दाफाश 

यह दर्दनाक मामला अक्टूबर 2025 में उस समय उजागर हुआ था, जब चाईबासा सदर अस्पताल के ब्लड बैंक से रक्त लेने वाले पांच मासूम बच्चों में एचआईवी संक्रमण की पुष्टि हुई थी। इस गंभीर चूक के सामने आने के बाद, झारखंड हाईकोर्ट के कड़े निर्देश पर सदर थाने में इस लापरवाही को लेकर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR)दर्ज की गई थी।मामले की शुरुआत तब हुई जब एक सात वर्षीय थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे को 13 सितंबर 2025 को ब्लड बैंक से लेकर रक्त चढ़ाया गया था। इसके बाद 18 अक्टूबर को हुई नियमित जांच में वह मासूम बच्चा एचआईवी पॉजिटिव पाया गया। बच्चे के पिता ने तुरंत ब्लड बैंक प्रबंधन पर घोर लापरवाही का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई। मीडिया में यह खबर आते ही झारखंड हाईकोर्ट ने मामले पर स्वतः संज्ञान लिया था। 

जांच में पांच बच्चे पाए गए थे संक्रमित  

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद स्वास्थ्य सेवा निदेशक डॉ. दिनेश कुमार के नेतृत्व में झारखंड राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटी (JSACS) की एक विशेष टीम ने चाईबासा पहुंचकर मामले की विस्तृत जांच की थी। गहन जांच के दौरान चार अन्य थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों में भी संक्रमण की पुष्टि हुई, जिससे कुल संक्रमित बच्चों की संख्या बढ़कर पांच हो गई। संक्रमित पाए गए सभी बच्चों की उम्र सात से आठ वर्ष के बीच है और ये सभी जीवित रहने के लिए वर्षों से नियमित रूप से रक्ताधान (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) पर निर्भर थे। 

अलग-अलग स्रोतों से संक्रमण की आशंका  

तत्कालीन उपायुक्त चंदन कुमार ने पूर्व में बताया था कि संक्रमित पाए गए पांचों बच्चों के रक्त समूह (Blood Groups) अलग-अलग हैं। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि यह भयानक संक्रमण किसी एक रक्तदाता (डोनेशन) की गलती से नहीं, बल्कि अलग-अलग स्रोतों और अलग-अलग समय पर बरती गई लापरवाही के कारण फैला है। प्रशासन ने उस समय के रक्तदाताओं के रिकॉर्ड खंगालने शुरू कर दिए थे। जांच में यह भी सामने आया था कि अधिकांश रक्त सरकारी शिविरों के माध्यम से आया था, जबकि कुछ मामलों में निजी स्रोतों से भी रक्त लिया गया था। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने पाया कि कागजी रिकॉर्ड तो सामान्य दिख रहे थे, लेकिन ब्लड बैंक की वास्तविक कार्यप्रणाली और स्क्रीनिंग (निगरानी) व्यवस्था बेहद लचर थी।

अदालत के फैसले से बढ़ीं मुश्किलें 

सीजेएम अदालत द्वारा अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद अब दोनों वरिष्ठ डॉक्टरों की कानूनी मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं और उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। इस पूरे प्रकरण ने राज्य की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और रक्त सुरक्षा प्रणालियों (Blood Safety Rules) की विश्वसनीयता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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