एसीसी संकट से मजदूरों के घरों में छायी आर्थिक संकट

 एसीसी संकट से मजदूरों के घरों में छायी आर्थिक संकट



मजदूरों ने कहा, कंपनी नहीं खुली तो पलायन ही अंतिम रास्ता

बंदी को लेकर अबतक आधिकारिक घोषणा नहीं

Santosh verma

Chaibasa: अडाणी ग्रुप द्वारा अधिगृहीत एसीसी झींकपानी प्लांट की अस्थायी बंदी के बीच आसपास के ग्रामीणों के बीच भुखमरी की आशंका उत्पन्न हो गयी है। कंपनी में कार्यरत मजदूरों तथा स्थानीय ग्रामीणों ने कंपनी को स्थायी बंदी से बचाने के लिये एक संस्था भी बनायी है जिसका नाम एसीसी बचाओ संघर्ष समिति रखा गया। समिति के लोगों ने इस संबंध में झींकपानी के झामुमो प्रखंड अध्यक्ष सोंगा बुड़ीउली तथा जोड़ापोखर मुखिया गुरूचरण मुंडा के नेतृत्व में कैबिनेट मंत्री दीपक बिरुवा से भेंट की थी और एसीसी फैक्ट्री को बंद होने से बचाने की गुहार लगायी थी। ग्रामीणों ने श्री बिरुवा कहा कि एसीसी को बंद होने से बचाया जाये। क्योंकि यही फैक्ट्री झींकपानी में रोजी-रोटी का आधार है। फैक्ट्री के आसपास गांवों की जिंदगी फैक्ट्री के रोजगार पर टिकी है। इसके अलावे जोड़ापोखर में सैकड़ों दुकानें हैं जैसे पंसारी की दुकानें, होटल, जेनरल स्टोर, मेडिकल स्टोर, सैलून, बैंक, साइकिल रिपेयरिंग शॉप, ठेले व खोमचेवाले, फलों की दुकानें, सब्जी दुकानें, मिल्क स्टॉल, कपड़े की दुकान, कोल्ड ड्रिंग्स की दुकानें, किताब दुकान आदि शामिल हैं। सर्वाधिक दुकानें कंपनी के नजदीक जोड़ापोखर तथा एसीसी कॉलोनी में पड़ती हैं। लेकिन कंपनी की फिलहाल इस अस्थायी बंदी से इनकी रोजी रोटी पर संकट गहरा गया है। ग्राहक कम हो गये हैं। कई दुकानें तो ग्राहकों के अभाव में बंद हो गयीं हैं और बाकी बंदी के कगार पर हैं। 

शनिवार हाट भी हुआ बेरौनक

एसीसी फैक्ट्री के नजदीक ही जोड़ापोखर में प्रत्येक शनिवार को साप्ताहिक हाट लगता है। लेकिन एसीसी संकट का प्रभाव इस पर भी पड़ा है। ग्राहकों की परचेजिंग पावर घटने से हाट की खरीददारी खासी प्रभावित है। दरअसल इस हाट की खरीद-बिक्री एसीसी फैक्ट्री के नियमित संचालन पर निर्भर है। दरअसल आसपास के ग्रामीण इसी फैक्ट्री में काम करके परिवार चलाते हैं। ऐसे में कंपनी की अस्थायी बंदी ने हाट बाजार भी प्रभावित हुआ है। 

शटडाउन की अबतक आधिकारिक पुष्टि नहीं

एसीसी सीमेंट वर्क्स झींकपानी फिलहाल अस्थायी रूप से बंद है। कंपनी प्रबंधन की ओर से इसके पीछे कारण क्लिंकर डस्ट की आपूर्ति बाधित होना बताया जा रहा है। लेकिन आधिकारिक तौर पर स्थायी बंदी की घोषणा नहीं की गयी है। ग्रामीण इसी कारण संशय में हैं कि यह बंदी स्थायी है या फिर अस्थायी। यह फैक्ट्री करीब एक माह से बंद पड़ा है। कामगार घर में खाली बैठे हैं। 

मजदूरों को सता रहा पलायन का डर

फैक्ट्री की बंदी के बाद मजदूरों को अब पलायन का डर सताने लगा है। आसपास के गांव जोड़ापोखर, कोंदवा, दोकट्टा, राजंका, नीमडीह, कुदाहातु, सिमजंग, माटागूटू, बिष्टुम्पुर, मौटाबासा, बिंगतोपांग आदि गांवों के ग्रामीण इसी  फैक्ट्री में काम करते थे। अधिकत्तर लोग अस्थायी हैं और ठेका मजदूर हैं। सप्लाई व लोडिंग अनलोडिंग में भी अस्थायी मजदूर ही कार्यरत हैं। मजदूर कह रहे हैं कि दुबारा एसीसी नहीं खुलता है तो वेरोजगार के लिये पलायन कर जायेंगे। क्योंकि आसपास में रोजगार का दूसरा कोई साधन भी नहीं है। हमें रोजगार के लिये बाहर निकलना ही होगा। अन्यथा परिवार के समक्ष भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। 

फैक्ट्री निर्माण के लिये ग्रामीणों ने दी थी जमीन

अडाणी ग्रुप द्वारा अधिगृहीत व संचालित एसीसी की झींकपानी यूनिट की स्थापना 1936 में हुई थी। टोंटो प्रखंड की सीमा पर जोड़ापोखर में यह प्लांट लगायी गयी थी। इसके लिये आसपास के गांवों के रैयतों ने जमीन दान की थी। इसमें कोंदवा, जोड़ापोखर, नीमडीह, राजंका, कुदाहातु, दोकट्टा आदि के रैयत शामिल हैं। रैयतों की जमीन पर ही फैक्ट्री के अलावे एसीसी क्वार्टर कॉलोनी, एसीसी मार्केट, बैंक, डीएवी स्कूल, एसीसी अस्पताल, खेल मैदान, क्लब मैदान, मैनेजेरियल स्टाफ बांग्ला तथा क्वार्टर, जलापूर्ति सिस्टम समेत दो बड़े चूना पत्थर खदान मौजूद है। इसमें से एक खदान से चूना पत्थर का उत्खनन होता है तो दूसरे से जलापूर्ति होती है। इसके अलावे खदान से प्लांट तक चूना पत्थर पहुंचाने के लिये एशिया का सबसे बड़ा कन्वेयर बेल्ट लगायी गयी है। इतना ही नहीं, सीमेंट निर्माण के लिये झारखंड का सबसे बड़ा कूलिंग टावर भी इसी प्लांट में है। वहीं गुमुवा नदी से कंपनी को पानी मिलता है। सीमेंट ढुलाई के लिये कंपनी को रेल नेटवर्क से भी जोड़ा गया है। इसके लिये भी ग्रामीणों ने अपनी कृषि भूमि दी थी। इसी भूमि पर रेलवे ट्रैक लगी है जो झींकपानी स्टेशन और एसीसी को आपस में जोड़ता है। कंपनी बंद होने से अब यहां काम करनेवाले लोग भी बेरोजगार हो गये हैं।

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