चाईबासा: शुरुआत की नींव कोल्हान नितिर तुरतुंग (KNT) की स्थापना की जड़ें 2020 की उस वैश्विक महामारी में छिपी हैं, जब कोरोना वायरस ने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया था। भारत में लॉकडाउन लगने से लाखों मजदूर फंस गए – कुछ बंदुआ मजदूरी की जंजीरों में, कुछ भूख-प्यास से जूझते हुए। इसी संकट में कोल्हान क्षेत्र के कुछ संवेदनशील युवाओं ने कोल्हान कोरोना रिलीफ टीम (KCRT) का गठन किया। नौकरीपेशा लोगों से चंदा इकट्ठा कर टीम ने प्रवासी मजदूरों को उनके गाँव लौटने में मदद की – बस, ट्रेन या पैदल यात्रा के लिए किराया, राशन किट और दवाइयाँ उपलब्ध कराईं। जो लोग वहीं फंसे थे, उन्हें नियमित रूप से भोजन, पानी और मेडिकल सहायता पहुँचाई गई। लॉकडाउन के पूरे दौर में KCRT ने हजारों जीवन को सहारा दिया, और जब 2020 के मध्य में प्रतिबंध हटे, तो टीम के सदस्यों ने सोचा: "युवाओं को मार्गदर्शन दिया जाए। पलायन की जड़ रोजगार की कमी है। क्यों न हम युवाओं को सशक्त बनाएँ?" इसी विचार से शिक्षा और रोजगार की दिशा में कदम बढ़ाया गया। लाइब्रेरी और स्टडी सेंटर खोलने का फैसला लिया गया, और चाईबासा में जगह भी तय कर ली गई।
आज से ठीक पाँच साल पहले, 1 नवंबर 2020 को चाईबासा के प्रतिष्ठित मानकी मुण्डा सभागार में KNT का पहला लाइब्रेरी व स्टडी सेंटर उद्घाटन हुआ। इसी अवसर पर KCRT का नाम बदलकर कोल्हान नितिर तुरतुंग (KNT) रखा गया, जो हो भाषा में "कोल्हान की नई दिशा" का प्रतीक है। यह सेंटर "पे बैक टू सोसाइटी" मॉडल पर चलता है – समाज के लोग स्वैच्छिक डोनेशन देते हैं, और इसी से सभी खर्चे चलते हैं। स्टूडेंट्स से कोई ट्यूशन फीस नहीं ली जाती, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के युवा बिना बोझ के पढ़ सकें। प्रत्येक सेंटर में स्थानीय लोग शामिल, जो सेंटर टीम की देखरेख करते हैं। पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित। किताबें, फर्नीचर, बिजली – सब डोनेशन से। कोई सरकारी फंडिंग नहीं।
कोल्हान नितिर तुरतुंग एक टीम नहीं, एक आंदोलन है। कोरोना के अंधेरे से निकलकर शिक्षा की रोशनी फैलाने वाला यह सफर साबित करता है कि छोटी शुरुआत बड़ा बदलाव ला सकती है।
