वन नेशन वन इलेक्शन की चर्चा आम हो चुकी है। माननीय अपनी योजनाओं की स्वीकृति जल्द से जल्द कराने की कोशिश में लग गए
माननीयों के दबाव में जिला परिषद को डीएमएफटी की योजना नही दिए जाने का आरोप लगने लगा
चाईबास (संतोष वर्मा) : पश्चिमी सिंहभूम जिले में डीएमएफटी फंड में राशि की कमी नहीं है, लेकिन योजना का प्राक्कलन बनाने में एक से छः माह लगने और प्रशासनिक स्वीकृति मिलने में छः माह से भी अधिक समय लगने से माननीय लोग हैं परिशान, जिला प्रशासन हैं इतमीनान। जबसे वन नेशन वन इलेक्शन की बात केंद्र सरकार के द्वारा बात कही गई है, तब से माननीयों की चिंता साफ दिखाई दे रही है। माननीयों को यह चिंता सताने लगी है कि केंद्र सरकार के द्वारा बुलाई गई विशेष सत्र में वन नेशन वन इलेक्शन का प्रसताव पारित किया जाता है तो, झारखंड में बहुत जल्द आचार संहिता लागू हो जायेगा,ऐसे में योजना की स्वीकृति पर रोक लग जायेगी।
गौरतलब है कि जिला के तकनीकि विभाग के एजेंसी लगभग दो सौ से अधिक योजना का प्राक्कलन अब तक नहीं जमा किए हैं, वहीं जमा किए गए प्राक्कलन की स्वीकृति विगत तीन माह से लम्बित रखा गया है।
अधिकारियों पर उपलब्ध राशि नहीं खर्च करने का आरोप
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार समाहरणालय में बैठे जिला प्रशासन के वरीय पदाधिकारी जान बुझ कर उपलब्ध राशि को खर्च नही कर रहें हैं। सवास्थ्य और शिक्षा के छेत्र में अब भी अधिक से अधिक योजना की स्वीकृति देने की आवश्यकता है।
उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र में कनेक्टिविटी रोड की स्वीकृति की योजना लम्बित है, जिसकी आवश्यकता अधिक है, पुलिस प्रशासन तथा वन छेत्र के ग्रामीणों को अच्छे सड़क की सुविधा देना बहुत ही जरूरी है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में ग्रामीण कार्य विभाग के सचिव, पथ निर्माण विभाग के सचिव, जिला के उपायुक्त, अभियंता प्रमुख, मुख्य अभियंता स्तर की कई बार उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र तथा खनन छेत्र के सड़कों को जोड़ने और आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराने वाली आशा अब निराशा में बदलने लगी है। वन नेशन वन इलेक्शन की चर्चा आम हो चुकी है।
माननीय अपनी योजनाओं की स्वीकृति जल्द से जल्द कराने की कोशिश में लग गए हैं।
कई माननीय एक साथ डीसी से मिल कर योजनाओं की स्वीकृति की मांग कर चुके हैं। पथ निर्माण और ग्रामीण कार्य विभाग की योजनाओं की सूची को अंतिम रूप नही दिया गया है। जिला परिषद के सदस्यों ने डीसी के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। लगातार डीएमएफटी की योजनाओं से जिला परिषद के सदस्यों को दूर रखने का मामला तुल पकड़ने लगा है। जिला परिषद के अध्यक्ष डीएमएफटी के पदेन सदस्य है, लेकिन सांसद विधायक की तरह डीसी योजना की सूची नही मांगते हैं, उसी तरह खनन प्रभावित क्षेत्र के मनोहरपुर और नोआमुंडी प्रखण्ड के प्रमुख भी डीएमएफटी के सदस्य हैं, लेकिन इन्हें भी नही पुछा जाता है। उसी तरह नोआमुंडी, गुआ, किरीबुरू पंचायत के मुखिया भी डीएमएफटी के सदस्य हैं, जिसे पूरी तरह से डीएमएफटी की के निर्णय से दूर रखा जाता है। जॉन मिर्न मुंडा इस तरह की डीसी के द्वारा जिला परिषद की उपेक्षा के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। डीएमएफटी फंड को लेकर माननीय और जिला परिषद आमने सामने। अन्य एजेंसी की तरह जिला परिषद को डीएमएफटी फंड देने की आवाज़ उठने लगी है।
माननीयों के दबाव में जिला परिषद को डीएमएफटी की योजना नही दिए जाने का आरोप लगने लगा।
डीडीसी के राजनीतिक चाल से जिला परिषद के सदस्यों की चलती और बोलती बंद। जिला परिषद में कमिशन वसुली का खेल नही होने के कारण योजना नही दी जाती है, मात्र कुछ योजना दे कर कॉलम पूरा करती है जिला प्रशासन। सूत्रों की माने तो जिला परिषद के एक सदस्य डीएमएफटी/पीएमकेकेवाई के गाईड लाईन को आधार बना कर योजनाओं की स्वीकृति देने, योजनाओं के लिए अनुशंसा का मापदण्ड तथा 60 प्रतिशत और 50 प्रतिशत के अनुपात पर योजनाओं का चयन, खनन प्रभावित क्षेत्र की अनदेखी, को आधार बना कर डीसी के खिलाफ हाई कोर्ट में केस दर्ज करेंगें।
