एमएमडीआर एक्ट को लेकर गांव-गांव में भ्रम फैला रहा झामुमो-कांग्रेस : मधु कोड़ा
संतोष वर्मा
Chaibasa ः पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने शुक्रवार को चाईबासा कैफेटेरिया में आयोजित प्रेस वार्ता में एमएमडीआर एक्ट को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा एवं कांग्रेस द्वारा जनता के बीच फैलाए जा रहे भ्रम पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि गांव-गांव में यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि केंद्र सरकार झारखंड का पैसा रोक रही है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।श्री कोड़ा ने कहा कि झारखंड सरकार को खनिज रॉयल्टी, डीएमएफटी, जीएसटी, वैट तथा उत्पाद शुल्क सहित विभिन्न मदों से प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। केवल खनिज आधारित राजस्व की बात करें तो राज्य को हर वर्ष बड़ी राशि प्राप्त होती है। इसके बावजूद जनता को यह बताने के बजाय कि इस राजस्व का उपयोग कहां और कैसे हो रहा है, केंद्र सरकार पर पैसा रोकने का निराधार आरोप लगाकर जनता को भ्रमित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को बदनाम करने के बजाय झारखंड सरकार को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। राज्य सरकार द्वारा कच्चे माल और खनिजों पर अतिरिक्त सेस/उपकर लगाने से उत्पादन लागत बढ़ रही है। इसका सीधा असर उद्योगों और आम जनता पर पड़ रहा है। लोहे से बनने वाली कुदाल, बेलचा, कृषि उपकरण से लेकर घर बनाने में इस्तेमाल होने वाली निर्माण सामग्री तक महंगी हो रही है। अंततः इसका बोझ किसान, मजदूर, छोटे कारोबारी और आम उपभोक्ता पर पड़ता है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि अतिरिक्त कर और सेस के कारण झारखंड में छोटे एवं मध्यम स्तर की अनेक आयरन तथा अन्य लघु औद्योगिक इकाइयां प्रभावित हुई हैं। 50 से अधिक छोटी आयरन एवं संबंधित इकाइयों के बंद होने तथा हजारों लोगों के रोजगार प्रभावित होने की बात सामने आ रही है। उन्होंने सवाल किया कि जब उद्योग बंद हो रहे हैं और रोजगार के अवसर घट रहे हैं, तब सरकार नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने तथा बंद उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए क्या ठोस कदम उठा रही है?श्री कोड़ा ने कहा कि झारखंड में लगभग 42 लौह अयस्क खदानों में से केवल करीब 6 खदानों में ही वर्तमान में उत्पादन हो रहा है, जबकि बड़ी संख्या में खदानें बंद हैं। यदि बंद खदानों को नियमों के तहत पारदर्शी प्रक्रिया से चालू किया जाए और पर्यावरणीय एवं वैधानिक मानकों का पालन करते हुए उत्पादन बढ़ाया जाए, तो राज्य को रॉयल्टी एवं अन्य राजस्व मदों से बड़ी आय प्राप्त हो सकती है। उस राशि का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और रोजगार जैसे जनकल्याणकारी कार्यों में किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में उत्पादन की लागत को नियंत्रित रखना अत्यंत आवश्यक है। दुनिया के बाजार में जहां दूसरे राज्य और देश अपने उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं, वहीं खनिज और कच्चे माल पर अतिरिक्त बोझ डालने से झारखंड के उद्योग महंगे पड़ेंगे और निवेशक दूसरे राज्यों की ओर चले जाएंगे।
उन्होंने पड़ोसी राज्य ओडिशा का उदाहरण देते हुए कहा कि ओडिशा आज औद्योगिक विकास, आधारभूत संरचना और रोजगार के क्षेत्र में झारखंड से आगे निकल चुका है। झारखंड के युवा और मजदूर रोजगार की तलाश में ओडिशा, पश्चिम बंगाल तथा देश के दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। यह स्थिति राज्य सरकार की औद्योगिक एवं रोजगार नीति पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
श्री कोड़ा ने कहा कि झारखंड सरकार के सत्ता में आने के बाद से नए उद्योग और नई खदानों के संचालन की दिशा में अपेक्षित गति दिखाई नहीं दे रही है। सरकार को यह बताना चाहिए कि बंद खदानों को खोलने, उद्योगों को पुनर्जीवित करने और नए निवेश को आकर्षित करने के लिए उसकी ठोस कार्ययोजना क्या है।
उन्होंने लघु खनिजों और बालू की व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार को स्थानीय लोगों के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। पेसा कानून लागू होने के बाद ग्राम सभाओं को उनके अधिकार और निर्णय की भूमिका मिलनी चाहिए। बालू जैसे लघु खनिजों से स्थानीय स्तर पर रोजगार और राजस्व का लाभ ग्राम समुदाय तक पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकार द्वारा लघु खनिजों के पारदर्शी टेंडर और स्थानीय अधिकारों के संबंध में स्पष्ट नीति नहीं बनाए जाने से अव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य है, लेकिन दुर्भाग्य है कि यहां के लोग आज भी बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने सरकार से सवाल किया कि जब राज्य के पास प्राकृतिक संसाधनों और राजस्व के इतने बड़े स्रोत हैं, तो जनता को उसका लाभ क्यों नहीं मिल रहा है?
उन्होंने सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याणकारी योजनाओं की स्थिति पर भी चिंता जताते हुए कहा कि वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति एवं स्टाइपेंड, आंगनबाड़ी तथा सहिया के मानदेय जैसी योजनाओं के भुगतान में देरी या समस्याओं को सरकार को गंभीरता से दूर करना चाहिए। गरीब और जरूरतमंद परिवारों को सरकारी योजनाओं के लिए परेशान होना पड़े, यह किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए चिंता का विषय है।
मधु कोड़ा ने कहा कि झारखंड सरकार को संघीय ढांचे का सम्मान करना चाहिए और केंद्र तथा राज्य के बीच अनावश्यक टकराव पैदा करने के बजाय विकास के लिए मिलकर काम करना चाहिए। जनता के बीच गलतफहमी और भ्रामक बातें फैलाकर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास बंद होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “झारखंड सरकार जनता को बरगलाने के बजाय यदि ईमानदारी से राज्य के संसाधनों, उद्योगों, खदानों और राजस्व का सही प्रबंधन करे, तो झारखंड देश के सबसे विकसित और समृद्ध राज्यों में शामिल हो सकता है। सवाल केंद्र सरकार पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि यह है कि राज्य के पास मौजूद संसाधनों का लाभ झारखंड की जनता तक क्यों नहीं पहुंच रहा है।”
पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार से मांग की कि बंद खदानों और उद्योगों को नियमों के तहत शीघ्र चालू करने, निवेश को प्रोत्साहित करने, अतिरिक्त कर एवं सेस के प्रभाव की समीक्षा करने, लघु खनिजों में पारदर्शिता लाने तथा पेसा कानून के अनुरूप ग्राम सभाओं को अधिकार देने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।उन्होंने कहा कि झारखंड की जनता अब आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि विकास, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं का हिसाब चाहती है।
