सरायकेला/हेमंत महाली: विश्व पटल पर अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका सरायकेला का छऊ नृत्य आज एक विडंबना का सामना कर रहा है। एक ओर यह लोकनृत्य यूनेस्को की इनटेंजिबल कल्चरल हेरिटेज सूची में शामिल होकर अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त कर चुका है, वहीं दूसरी ओर इस परंपरा को जीवित रखने वाले स्थानीय कलाकार आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
जिले में समय-समय पर भव्य सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। बड़े मंच सजते हैं, आकर्षक रोशनी और साज-सज्जा पर मोटी रकम खर्च की जाती है। लेकिन इन आयोजनों पर खर्च होने वाली राशि का वास्तविक लाभ जमीनी स्तर पर कलाकारों तक कितनी पहुंचती है, यह सवाल अब भी अनुत्तरित है।
इंटरनेशनल डांस डे की पूर्व संध्या पर हकीकत आई सामने
अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस की पूर्व संध्या पर जब छऊ कलाकारों की वर्तमान स्थिति का जायजा लिया गया, तो तस्वीर भावुक कर देने वाली थी। जिन कलाकारों ने देश-विदेश में प्रस्तुति देकर सरायकेला को गौरवान्वित किया, वे आज जीविका के लिए छोटे-मोटे कार्य करने को मजबूर हैं। कोई सब्जी बेचकर परिवार चला रहा है, तो कोई घरों में खाना बनाकर आजीविका कमा रहा है। कुछ कलाकार दिहाड़ी मजदूरी या छोटे व्यवसाय में लगे हुए हैं।
इन कलाकारों की वास्तविक स्थिति को सामने लाने के लिए उनकी वर्तमान जीवन परिस्थितियों और संघर्ष की कहानियों को साझा किया जा रहा है, ताकि समाज और प्रशासन दोनों इस सच्चाई से रूबरू हो सकें।
योजनाएं बनीं, पर बदलाव नहीं दिखा
कलाकारों को स्थायी रोजगार से जोड़ने की दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नजर नहीं आती। जो योजनाएं बनीं भी, वे जमीनी असर छोड़ने के बजाय औपचारिकता तक सीमित रह गईं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि छऊ कलाकारों को सम्मानजनक आजीविका से कैसे जोड़ा जाए। अब तक सरकारी नियुक्तियों और योजनाओं में कलाकारों के लिए किसी विशेष प्रावधान या आरक्षण की मांग भी गंभीरता से नहीं उठाई गई है, जबकि यह समय की आवश्यकता बन चुकी है।
यदि सरकार की विभिन्न योजनाओं और नियुक्ति प्रक्रियाओं में कलाकारों के लिए सुनिश्चित हिस्सेदारी तय की जाए, तो न केवल इस परंपरा को संरक्षित किया जा सकता है, बल्कि कलाकारों को उनके योगदान के अनुरूप सम्मानजनक जीवन भी मिल सकेगा।
छऊ की चमक मंच पर भले ही बरकरार हो, लेकिन उसके असली संवाहकों के जीवन में उजाला लाने की जिम्मेदारी अब समाज और प्रशासन दोनों पर है।





