सारंडा वाइल्ड सेंचुरी मामले में अपने ही बुने जाल में उलझ कर रह गई झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन की सरकार
केंद्र की भाजपा सरकार को बदनाम करने की साजिश सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद हुई बेनकाब
मौका परस्त दोहरी राजनीति से बाज आए झारखंड मुक्ति मोर्चा*- *पूर्व सांसद गीता कोड़ा”
संतोष वर्मा
चाईबासाःसारंडा रिजर्व फॉरेस्ट पर माननीय सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश ने साफ कर दिया है कि जंगलों में बसे आदिवासी–मूलवासी समुदाय के अधिकार कभी समाप्त नहीं हुए थे और न ही खत्म किए जा सकते हैं। Forest Rights Act, 2006 की धारा 3 और धारा 4(1) के अनुसार आवास, भूमि, सामुदायिक वनाधिकार और पारंपरिक जीवन से जुड़ी सभी सुविधाएँ पूरी तरह सुरक्षित हैं। इससे यह सिद्ध हो गया है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा फैलाया गया भय और भ्रम पूरी तरह निराधार था। पूर्व सांसद गीता कोड़ा ने उत्त बातें कही,
भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि झामुमो के सांसद -विधायक और मंत्री पहले कैबिनेट में सेंचुरी प्रक्रिया पर सहमति देते रहे और बाद में उसी निर्णय के खिलाफ सड़क पर उतरकर जनता को गुमराह करते रहे। कभी आर्थिक नाकेबंदी की धमकी दी गई, कभी केंद्र सरकार पर झूठे आरोप लगाए गए। जबकि वास्तविकता यह रही कि पूरी प्रक्रिया राज्य सरकार की सहमति से हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब यह स्पष्ट हो गया कि किसी को उजाड़ने की बात ही नहीं है, तब झामुमो ने चुपचाप अपनी नाकेबंदी वापस ले ली, जिससे उनकी राजनीतिक नौटंकी पूरी तरह उजागर हो गई।
भाजपा स्पष्ट करती है कि आदिवासी समाज के संवैधानिक और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार हमेशा प्रतिबद्ध रही है। FRA, PESA, वन धन योजना और जनजातीय विकास के लिए सतत निवेश केंद्र की जनहितैषी नीतियों का प्रमाण है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन्हीं कानूनों के आधार पर अधिकारों की सुरक्षा की पुष्टि होना केंद्र की नीयत और प्रतिबद्धता को मजबूती देता है।
भाजपा का मानना है कि अब जनता समझ चुकी है कि कौन उनके जल–जंगल–जमीन का सच्चा रक्षक है और कौन केवल राजनीति के लिए भ्रम फैलाता रहा है।
