नक्सलवाद के आगे दम तोड़ रही विकास योजनाएं
santosh verma
Chaibasa: जिला मुख्यालय चाईबासा से 50 किलोमीटर दूर टोंटो प्रखंड के दुरूह जंगलों में बसे टोपाबेड़ा गांव आज भी उपेक्षा का दंश झेलने को विवश है। यह गांव पूरी तरह नक्सल प्रभावित है और भौगोलिक रूप से ऐसी जगह स्थित है जहां के ग्रामीण बरसात के मौसम में टापू की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि मूलभूत सुविधाओं से वंचित इस गांव के लोगों को गांव से बाहर जाना हो तो उनको गांव के बगल से गुजरने वाली पुलियाविहीन देवनदी पार करना पड़ड़ा है। लेकिन बरसात में जलस्तर बढ़ने से तैरकर पार करना मुश्किल होती है। इस कारण टोपाबेड़ा के ग्रामीण लगातार कई सप्ताह या फिर महीने भर तक गांव में ही कैद हो जाते हैं।
गांव से बाहर निकलने का एकमात्र शॉर्टकट रास्ता यही है। दूसरा रास्ता भी है। लेकिन उस रास्ते से पंद्रह-बीस किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है। इससे उनके ऊपर समय व पैसे का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसलिये ग्रामीण शॉर्टकट रास्ते को तरजीह देते हैं। लेकिन बरसात में नदी का जलस्तर बढ़ता है तो पार होना असंभव हो जाता है और महीनेभर की खाने-पीने की चीजें संचित कर लेते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके। ग्रामीणों का कहना है कि देवनदी पर पुल की जरूरत है। पुल बन जाता है, तो ग्रामीणों को बड़ी राहत मिलेगी। ग्रामीणों ने बताया कि देवनदी पर पुल निर्माणाधीन है। निर्माण कार्य कब होगा, पता नहीं।
नक्सलियों के भय से विकास योजनाएं तोड़ रही है दम
ग्रामीण घनश्याम लागुरी, नरेश पान, रघु लागुरी, संजय लागुरी आदि बताते हैं कि विकास योजनाएं तो गांवों के लिये बनती हैं। लेकिन नक्सलियों के भय से योजनाएं यहां समय पर क्रियान्वित नहीं हो पाती हैं या फिर क्रियान्वित ही नहीं की जाती हैं। कोई जनप्रतिनिधि या सरकारी अफसर भी गांवों का दौरा नहीं करते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं से भी गांव वंचित है। पेयजल व रोड कनेक्टिविटी भी नहीं है। नतीजतन ग्रामीण आज भी उपेक्षा का जीवन जीने को विवश हैं।
