लोकतंत्र के महापर्व में छऊ को लेकर उठ रही आवाज, लोग माननीयों को मान रहे दोषी, चुनाव में ठप्पा कहां गिरेगी कहना है मुश्किल


सरायकेला/दीपक कुमार दारोघा : निर्वाचन आयोग के घोषणा के साथ ही लोकतंत्र का महापर्व शुरू हो चुका है। चाय होटल से शीर्ष सरकारी कार्यालय तक चुनाव की चर्चा है। सरकारी कर्मचारी भी चुनावी कार्य में जुटे हैं। चुनावी चर्चा में झारखंड से लेकर दिल्ली तक जहां भ्रष्टाचार की बातें लोगों में आम बन चुकी है। प्रचंड गर्मी में प्रवर्तन निदेशालय के कर्मी अपने कर्तव्य के प्रति सजग है। और छोटे से बड़े तथाकथित भ्रष्टाचार्यों को जेल भिजवाने में सक्रिय है। वहीं निर्वाचन आयोग मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए मतदाताओं को मतदान के प्रति जागरूक करने हेतु बल दिया है।

सरायकेला खरसांवा जिला की बात करें तो पाएंगे कि इस जिला से तीन लोकसभा क्षेत्र जुड़े हैं।

इस जिला का ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र रांची लोकसभा क्षेत्र से जुड़ा है।जबकि खरसांवा विधानसभा क्षेत्र खूंटी लोकसभा क्षेत्र से जुड़ा है। और सरायकेला विधानसभा क्षेत्र सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र से जुड़ा है। लोगों में चर्चा है कि यहां से चुने जाने वाले सांसदगण सरायकेला की समस्या लोकसभा में नहीं उठाते हैं। यह भी चर्चा है कि विश्व प्रसिद्ध छऊ कला की धरती सरायकेला अपनी कला संस्कृति पर्यटन को लेकर मकड़जाल में फंसा हुआ है। लोगों को रोजगार का साधन नहीं है। यूनेस्को ने छऊ को इनटेंजिबल कल्चरल हेरिटेज घोषित किया है। फिर भी प्रसिद्ध छऊ कला की धरती सरायकेला को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करने के लिए किसी भी सांसद ने संसद में आवाज नहीं उठाई।


स्थिति यह है कि कला नगरी के लोग रोजगार के अभाव में दो जून की रोटी के लिए तरस रहे हैं। क्षेत्र पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित होने से टूरिस्ट गाइड के रूप में युवाओं को रोजगार का अवसर मिल पाता। लोगों में यह भी चर्चा हो रही है कि खरकाई नदी के तट क्षेत्र में प्राचीन भैरव पीठ स्थली है। जहां छऊ कलाकार प्रशिक्षण लेते थे।


करीब 500 साल पुराना यह पीठ स्थली पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित हो सकता है। नदी तट क्षेत्र में माजणा घाट अवस्थित है। जहां दुर्गा पूजा के समय अस्त्र-शस्त्र साफ कर माता के चरणों में रखकर पूजा अर्चना किया जाता रहा है। चैत्र पर्व (छऊ महोत्सव) के धार्मिक अनुष्ठान भी इसी नदी तट पर संपादित होता है। इस मनोरम स्थल को भी पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

माजणा घाट

यह भी चर्चा हो रही है कि छऊ कला को देश-विदेश में बुलंदियों तक पहुंचने वाले कला के पुरोधा नहीं रहे। इसमें अधिकतर पद्मश्री से नवाजे जा चुके हैं। एकमात्र राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र सरायकेला के सभी कर्मी सेवानिवृत हो चुके हैं। नृपराज राजकीय उच्च विद्यालय में कार्यरत छऊ नृत्य संगीत शिक्षक के अलावे।

राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र सरायकेला

पीआरडी पटना रांची नृत्य गीत नाटक प्रभाग में कार्यरत छऊ नृत्य संगीतकर्मी भी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके बावजूद किसी भी सांसद ने सदन में कला संस्कृति को बनाए रखने हेतु संसद में आवाज नहीं उठाई।

चर्चा यह भी है कि सरायकेला प्रिंसली स्टेट था। राजा रजवाड़ समय में ही सरायकेला छऊ कला विदेशों में भारतीय कला संस्कृति का बखान कर चुका था। देश स्वाधीन के बाद सरायकेला राजा आदित्य प्रताप सिंहदेव ने गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के समक्ष कटक में 1947 को कुछ शर्त के साथ सरायकेला राज्य को भारत में विलय कर दिया था।


पहले सरायकेला (सिंहभूम) ओड़ीसा फिर 1948 में केंद्र के फैसले से बिहार में शामिल हुआ। फिर बिहार के गर्व से झारखंड बना और इसी झारखंड का सरायकेला खरसावां जिला बना।

इस जिला से तीन लोकसभा सदस्य (सांसद) होने के बावजूद किसी भी सांसद ने संसद में झारखंड के छऊ कला की धरती सरायकेला के उत्थान के लिए आवाज नहीं उठाई। केवल मतदाताओं को मोहरा बनाकर उनके भावनाओं से खेलते आए हैं।

बताते चलें कि जहां भ्रष्टाचार देश को आगोश में लेने में सक्रिय है वहीं सरायकेला में भी लोग अपनी कला संस्कृति को बचाए रखने की दिशा में परेशान है। और माननीयों को इसके लिए दोषी मान रहे हैं।
चुनाव में मतदाताओं की ठप्पा कहां गिरेगी कहना मुश्किल है।

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