चाईबासा ( संतोष वर्मा ) : पश्चिमी सिंहभूम जिला के झीकपानी प्रखंड में मुख्य रूप से संचालित दो कंपनी ए सी सी एवं साई स्पंज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के मनमानी रवैया के कारण वहां के स्थानीय लोग अब मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित है, लोगों को पीने के लिए पेयजल तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है ना हीं खेती में सिंचाई के लिए जल उपलब्ध हो पा रहा है और बची हुई जमीन भी कंपनी से निकलने वाले डस्ट और कंपनी द्वारा इन उत्सर्जित डस्ट को जगह जगह फेक दिये जाने से जमीन में खेती करना भी अब संभव नहीं हो पा रहा है।
इन परिस्थितियों में जहां ग्रामीण अपनी पैतृक संपत्ति जमीन को कंपनी में इस उद्देश्य से दिए थे कि उनके आने वाले पीढ़ियों को रोजगार उपलब्ध हो पाएगा और झारखंड सरकार के द्वारा जहां यह संकल्प भी लिया गया है कि किसी भी कंपनी में स्थानीय लोगों को रोजगार में 75% की भागीदारी दी जाएगी। पर कंपनी द्वारा सरकार की इन बातो को अहमियत नहीं किए जाने के कारण अब क्षेत्र में पलायन की स्थिति बनी हुई है। यही कारण है कि अब ग्रामीणों को अपने हक की लड़ाई के लिए खुलकर मैदान में उतरना पड़ रहा है , झीकपानी स्थित एसीसी कंपनी पहले तो अपने सामाजिक दायित्व के तहत लोगों को पेयजल की सुविधा उपलब्ध करवाती थी किंतु वर्तमान में यह सुविधा बंद कर दी गई है वही कंपनी के जमीन पर गुजरने वाली गुमरा नदी पर जहां पहले 10 फीट से अधिक पानी उपलब्ध हुआ करती थी अब कंपनी द्वारा वहां डस्ट के निस्तारण से नदी की गहराई पूरी तरह से कम हो गई है और इससे पानी बिल्कुल नहीं के बराबर है इस परिस्थिति में ग्रामीणों को सबसे अधिक पेयजल की समस्या झेलनी पड़ रही है वही प्रखंड के नवागांव पंचायत में अवस्थित साईं स्पंज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड पानी की कमी को समझने के बावजूद भी भूगर्भीय जल के इस्तेमाल से कंपनी को चलाने का कार्य करती है जिससे जमीनी स्तर पर पानी बहुत ही नीचे चला गया है कंपनी चलाने के लिए कंपनी द्वारा 5 डीप बोरिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है जो क्षेत्र के लोगों के लिए पेयजल की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है इसके बावजूद कंपनी द्वारा सामाजिक दायित्व के तहत अब तक कुछ भी नहीं किया गया है।
पानी में ए सी सी लगभग 75 वर्ष पूर्व स्थापित हुई थी वही साई स्पंज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को स्थापित हुए अब तक लगभग 20 वर्ष पूरे हुए इस 20 वर्षों में कंपनी द्वारा ग्रामीणों की जमीन तो ले ली गई है और उस पर कंपनी भी स्थापित कर दी गई है उसके बावजूद ग्रामीणों के बीच रोजगार की समस्या अभी भी मुख्य रूप से खड़ी है एक और जहां लोग पेयजल की समस्या से जूझ रहे हैं वही कंपनी द्वारा डस्ट के निस्तारण में जगह जगह डस्ट को फेंक कर खेती लायक भूमि को बर्बाद करने का कार्य किया जा रहा है जिससे ग्रामीणों को जीविका चलाने में और अपने परिवार के लिए भोजन जुटाने में भी समस्या हो रही है डस्ट फैलने के कारण जो कि मुख्य रूप से गर्मी के मौसम में हवा के साथ और बरसात में पानी के साथ खेतों तक पहुंचती है इस कारण खेती लायक जमीन पूरी तरह से बर्बाद हो रही है हालांकि इस तरह से डस्ट को फेंकने का क्या औचित्य है यह सरकार को भी ध्यान देने की आवश्यकता है । कंपनी के मनमानी का आलम यह है कि कंपनी अपने रॉ मैटेरियल के आवागमन एवं प्रोडक्ट मटेरियल को भेजने के लिए ग्रामीण विकास विभाग द्वारा निर्मित सड़क का भी इस्तेमाल कर रही है हालांकि नियम के अनुसार किसी भी ग्रामीण विकास विभाग के सड़क पर कमर्शियल व्हीकल का इस तरह इस्तेमाल किया जाना अपने आप में सही नहीं है पर वह किसके आदेश पर खुलेआम यह काम कर रही है यह भी जांच का विषय है और कंपनी के द्वारा सड़क के इस्तेमाल लगातार किए जाने से सड़क की स्थिति भी पूरी तरह जर्जर हो गई है जिससे ग्रामीणों को आवागमन में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है और सड़क के जर्जर होने के कारण आए दिन गाड़ियां और साइकिल स्किट होती है जिससे ग्रामीणों को हमेशा चोट चपेट भी लगती रहती है कंपनी के इस मनमानी रवैया से अब आलम यह हो गया है कि लोग ना तो खेती कर पा रहे हैं ना ही उन्हें रोजगार मिल रहा है और ना ही वह अपने मूलभूत सुविधा को ही प्राप्त कर पा रहे हैं पेयजल तक की समस्या है ऐसी परिस्थिति में ग्रामीण और अतिरिक्त किस तरह की मांग को रख पाएंगे ।वही गुडा नदी पर हाक्युम धाम के पास लगभग 30 वर्ष पहले सर्वे हुई थी जिसमें चेक डैम निर्माण करने की बात कही गई थी इस चेक डैम के निर्माण से भी लोगों को पेयजल की समस्या से निजात मिल सकती थी किंतु आज 30 वर्ष बीत जाने के बाद भी वहां चेक डैम का निर्माण नहीं हो पाया है जिस कारण इस बरसाती नदी में पानी ठहर नहीं पाती है और लोगों को समस्या का सामना करना पड़ता है आज ग्रामीण अपनी मूलभूत सुविधा पेयजल की समस्या भोजन रोजगार एवं सबसे अधिक प्रदूषण से प्रभावित है जिस कारण उन्हें तरह-तरह के रोगों का सामना करना पड़ रहा है लेकिन कंपनी अपनी सामाजिक दायित्व के तहत नाथू प्रदूषण पर नियंत्रण कर रही है ना कोई मेडिकल सुविधा उपलब्ध करवा रही है ना ही शिक्षा पर ध्यान है इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए उद्योग को विकास का सूचक कैसे माना जा सकता है जब उधमी खुद ही अपने मनमानी रवैया के कारण स्थानीय लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करेंगे ऐसी परिस्थिति में अगर सरकार का हस्तक्षेप ना हो तो विभाग और कंपनी के साथ घाट से स्थानीय लोगों का जीवन का मूल्य शून्य हो जाएगा अतः माननीय मुख्यमंत्री को इस ओर ध्यान आकृष्ट करवाते हुए या बताना चाहता हूं कि वह इन तमाम मुद्दों पर ध्यान देते हुए कंपनी के मनमानी रवैया पर लगाम लगाने की कृपा करेंगे।
