झारखंड का सरायकेला श्री मंदिर व रथयात्रा मेला रहा ऐतिहासिक


 सरायकेला :  झारखंड के कलानगरी सरायकेला का श्री मंदिर व रथयात्रा मेला ऐतिहासिक रहा है। लोग आज भी श्री मंदिर दर्शन करना नहीं भूलते हैं। यहां तक कि रथयात्रा के अवसर पर मौसीबाड़ी में प्रभु के श्रृंगार भक्त श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है।


प्रभु जगन्नाथ के प्रति आस्था यह है कि रथ यात्रा मेला में असंख्य भक्त श्रद्धालु मौसीबाड़ी में प्रभु के दर्शन करने पहुंच रहे हैं। लोग यहां मेला का भी आनंद ले रहे हैं।जगन्नाथ मेला समिति के अध्यक्ष मनोज चौधरी ने बताया कि रथयात्रा धार्मिक भावना से जुड़ा पर्व है। रथयात्रा मेला इस क्षेत्र का बड़ा मेला है। 

मौसीबाड़ी (गुंडिचा मंदिर) में प्रभु के विभिन्न अवतारों का श्रृंगार भक्तों श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है।


मौसीबाड़ी पहुंचने पर प्रभु जगन्नाथ की मत्स्य, कच्छ अवतार का दर्शन हुआ। प्रभु की भव्य श्रृंगार से लोग भक्ति व आनंद की अनुभूति कर रहे थे। जगन्नाथ सेवा समिति के अध्यक्ष सिद्धार्थ शंकर सिंहदेव ने बताया कि सरायकेला में रथयात्रा व मेला काफी पुराना है। श्री मंदिर में जगन्नाथ के प्रति लोगों का आस्था बढ़ा है।


 रथयात्रा मेला को देखकर मंदिर को देखने की जिज्ञासा हुई। हम पहुंचे सरायकेला खरकाई नदी तट पर। माना जाता है कि किसी सभ्यता संस्कृति की विकास नदी तट पर हुई और समाज आगे बढ़ता गया। जी मैं बात कर रहा हूं जगन्नाथ संस्कृति का। पत्रकार दीपक कुमार दारोघा द्वारा लिखित पुस्तक "कहानी छऊ की" व विभिन्न सूत्रों से पता चलता है कि नृपत सिंह ने 1568 में सरायकेला में जगन्नाथ संस्कृति पल्लवित की थी। नृपत सिंह के समय पल्लवित, विकसित जगन्नाथ संस्कृति विक्रम सिंह के समय परवान चढ़ी और श्री मंदिर की नीव पड़ी। परवर्ती राजा के समय मंदिर पूरा हुआ। 

श्री मंदिर के सेवक सुशांत महापात्र ने भी स्पष्ट किया कि विक्रम सिंह के समय में मंदिर की नींव पड़ी थी। राजा उदित नारायण के समय में मंदिर पूरी हुई। मंदिर की कलाकृति चंद्रमोहन महापात्र के द्वारा बनाया गया था। प्रशांत महापात्र ने बताया कि उड़ीसा के बाद पहला श्री मंदिर सरायकेला में ही बना। महाराजा आदित्य प्रताप के समय में रथ यात्रा उत्कर्ष पर था। महाराजा द्वारा रथयात्रा में 'छेरापोहंरा' रस्म अदा की जाती थी। आज भी रथयात्रा में यह रस्म अदा की जाती है। वर्तमान राजा प्रताप आदित्य द्वारा 'छेरापोहंरा' रस्म पूरा की जाती है। पैलेस पहुंचने पर राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि पहले रथ विशाल हुआ करता था। सड़क अब संकरी हो गई है। रथयात्रा में लोगों में काफी उत्साह है। लोग मेला का आनंद लेने में मशगूल हैं। प्रशासन का सहयोग है। चारों और भक्ति व उल्लास का माहौल है।

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