चाईबासा ( संतोष वर्मा ) : आंबेडकराईट पार्टी ऑफ इंडिया सिंहभूम लोकसभा प्रभारी सह युवा नेता रामहरि गोप ने मजदूर दिवस पर कहा कि दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, तुम्हारे पास तुम्हारी बेड़ियों के अलावा खोने के लिए कुछ नही है।
उन्होंने ये भी कहा कि कार्ल मार्क्स के इस कथन मे क्रांति के वो बीज फूटे कि दुनिया भर में वर्ग संघर्ष मे पिस रहे मजदूरों को मार्क्सवाद मे अपने बच्चों का भविष्य नजर आने लगा। विरोध की गति तेज हुई, पूँजीवाद की अकड़ भी थोड़ी-थोड़ी ढ़ीली होनी शुरू हुई, पूँजीवाद की पोषक सरकारों को भी खासतौर पर युरोपियन देशों में मजदूर एकता के सामने झुकना पड़ा लेकिन ये मार्क्सवाद भारत मे आते-आते वर्ग संघर्ष की जगह जाति संघर्ष ज्यादा दिखने लगा।
उन्होंने कहा कि मजदूरों की भी जातियाँ होती है, मजदूर भी अपनी जातियों की ऊँच नीच को लेकर ही जीने को मजबूर थे क्योंकि धर्म ने बुद्धि पर कब्जा जो कर रखा था। इसीलिए यहाँ मजदूर एकता, किसान एकता आदि सब जातियों की भेंट ही चढ़ते चले गए। भारत मे मजदूरों के अधिकारो के लिए कुछ हद तक अम्बेड़करवाद तो पंजे मारता दिखता है लेकिन मार्क्सवाद दूर-दूर तक नजर नही आता। जातियों की ऊँच नीच के चलते दो शोषक बन गए, एक जातिवाद और दुसरा पूँजीवाद और इन दोनों का ही इलाज अम्बेड़करवाद है, मार्क्सवाद इसी मे मर्ज हो चुका है क्योंकि यहाँ मजदूर भी जातियों के हिसाब से ही ज्यादा मिलते है।
काम जातियों के हिसाब से बटे है, सवर्ण समाज मे मजदूर ना के बराबर है और दलित आदिवासी आदियों मे पूँजीपति ना के बराबर है। पिछड़ा वर्ग अपनी सहुलियत देखता है, जब पिछड़ी जातियो के रिजर्वेशन का फायदे वाली बात हो तो वो शोषित वर्ग बन जाता है वरना वो क्षत्रियपन का फितूर पाले शोषक बन जाता है।
