चांडिल में पंडित रघुनाथ मुरमू की जयंती समारोह आयोजित


ओलचिकी का सम्मान और प्रचार-प्रसार करने से ही पंडित रघुनाथ मुरमू की सच्ची श्रद्धांजलि होगी : विधायक सविता महतो

सरायकेला ( दीपक कुमार दारोघा ) : चांडिल, डोबो उत्क्रमित मध्य विद्यालय में ओल इतुन आसड़ा डोबो, टाटा स्टील फाउंडेशन जमशेदपुर एवं गुरु गोम्के पंडित रघुनाथ मुर्मू अकादमी, दिशम जाहेर करनडीह के संयुक्त तत्वावधान में ओलचिकी के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू के 118वां जयंती आयोजित।

 कार्यक्रम के दौरान सर्वप्रथम पूजा अर्चना की गई। एवं रघुनाथ मुर्मू की मूर्ति पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया। कार्यक्रम में विधायक सविता महतो भी पहुंची। लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया।उन्होंने पंडित रघुनाथ मुरमू को श्रद्धांजलि अर्पित की। मौके में आयोजन समिति का सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासी लिपि ओलचिकी का सम्मान और प्रचार-प्रसार करने से ही पंडित रघुनाथ मुरमू की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।ओलचिकी लिपि को अपनाकर ही भाषा संस्कृति को बचाया जा सकता है।आदिवासी कला संस्कृति सामुदायिकता का परिचय देती है। इसे बचाए रखने की जरूरत है।

मौके में विशिष्ट अतिथि अखिल भारतीय संताली लेखक संघ झारखंड इकाई के सचिव सुधीर चंद्र मुर्मू ने कहा कि आज ही के दिन वर्ष 1905 को वैशाख पूर्णिमा के दिन रघुनाथ मुर्मू जी का जन्म हुआ था। रघुनाथ मुर्मू बचपन से ही संताली भाषा के लिए लिपि की कमी को महसूस किया था‌। जब उन्हें विद्यालय में नामांकन कराया गया, उन्होंने विद्यालय जाने से मना कर दिया था। क्योंकि विद्यालय में संताली भाषा और अपनी लिपि में नहीं पढ़ाया जाता था। माता-पिता के द्वारा समझाया गया कि "दूसरे भाषा से ही पढ़-लिखकर कर आगे बढ़ो, बाद में तुम ही संताली भाषा को विकास की ओर ले जाओगे। और संताली लिपि को भी खोज निकालोगे"। 

इसके बाद रघुनाथ मुर्मू मन में ठान लिया था। संताली भाषा विकास के लिए और संताली लिपि को खोजने में लीन हो गये। वे मात्र 20 वर्ष की उम्र में ही वर्ष 1925 में संताली भाषा के लिए संताली लिपि ओलचिकी का आविष्कार किया। उनके द्वारा संताल समाज के लोगों को एकजुट करने के लिए और लिपि ओलचिकी की प्रचार प्रसार के लिए अलग-अलग राज्य में आदिवासी सामाजिक शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संगठन का स्थापित किया। उनके द्वारा ओलचिकी लिपि में विदू चांदान, दाड़े गे धोन, खेरवाड़ बीर, सिदो-कान्हू खेलोण्ड पुथी, हिताल, बांखेड़, पारसी पोहा ओल चेमेद आदि पुस्तकों का रचना किया गया। उन्हें पारसी सिञ चांदो, गुरु गोम्के, ओल गुरु के नाम से भी जाना जाता है। 

श्री सुधीर चंद्र मुर्मू ने कहा कि संताली भाषा संस्कृति बहुत ही समृद्ध है। इसे सजाने और संवारने की जरूरत है‌। संताली भाषा की लिपि ओलचिकी आदिवासी की पहचान है। उन्होंने कहा कि संताली भाषा भारतीय संविधान में सम्मिलित भाषा है।संताल अकादमी, संताली एडवाइजरी बोर्ड, संताली एजुकेशन बोर्ड का गठन समय की मांग है।झारखंड के सरकारी विद्यालयों में प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक संताली भाषा माध्यम में पठन-पाठन और प्रत्येक वर्ग और विषय के लिए शिक्षकों कि नियुक्ति भी समय की मांग है। कार्यक्रम में विशेष अतिथि सुखराम हेंब्रम ने भी संबोधित किया।इस कार्यक्रम में नृत्य गीत की भी प्रस्तुति हुई।

पुरे कार्यक्रम में मुख्य रूप से बुद्धेश्वर मार्डी, बद्रीनाथ मार्डी, लंबू किस्कू, सत्यरंजन सोरेन, सबीता किस्कू, शंकर मुर्मू, विभूति मार्डी, लेदेम मार्डी, अनिल मार्डी, लखन मुर्मू तथा तामोलिया पंचायत के सभी ग्रामवासी उपस्थित थे।

Post a Comment

Do live your Comments here! 👇

Previous Post Next Post