मधु कोड़ा का बयान झारखंड के खनिज अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश : बुधराम लागुरी

मधु कोड़ा का बयान झारखंड के खनिज अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश : बुधराम लागुरी



भाजपा उद्योगपतियों को लाभ और जनता को खंगाल बनाना चाहती है : बुधराम 

एमएमडीआर कानून पर पूर्व मुख्यमंत्री के बयान आधा सच और जनता को गुमराह करने का प्रयास : झामुमो 

संतोष वर्मा

चाईबासा : एमएमडीआर अधिनियम में संशोधन को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा द्वारा झारखंड सरकार पर लगाए गए आरोपों पर झामुमो जिला प्रवक्ता बुधराम लागुरी ने कड़ा पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि मधु कोड़ा केंद्र सरकार के पक्ष में तर्क देते हुए झारखंड के खनिज संसाधनों, राज्य के अधिकारों और आदिवासी-मूलवासी हितों से जुड़े मूल सवालों को जानबूझकर नजरअंदाज कर रहे हैं।

बुधराम लागुरी ने कहा कि एमएमडीआर कानून को लेकर झामुमो जनता के बीच कोई भ्रम नहीं फैला रहा, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे ऐसे कानूनी बदलावों के वास्तविक प्रभाव को जनता के सामने रखने का काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि यदि कानून पूरी तरह झारखंड के हित में है तो केंद्र सरकार और भाजपा नेताओं को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संशोधन के बाद राज्यों के खनिज राजस्व और उपकर लगाने के अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि झारखंड देश के सबसे समृद्ध खनिज राज्यों में शामिल है। यहां के लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट और अन्य खनिज संसाधनों का दशकों से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान रहा है। इसके बावजूद यदि खनिज संपदा पर राज्य के वित्तीय अधिकारों को सीमित करने की कोशिश होती है तो झारखंड की जनता उसका विरोध करेगी। बुधराम लागुरी ने मधु कोड़ा के उस तर्क पर भी सवाल उठाया जिसमें उन्होंने खनिजों की लागत कम करने और उद्योगों को बढ़ावा देने को संशोधन का उद्देश्य बताया। उन्होंने कहा कि उद्योगों की लागत कम करने के नाम पर खनिज संपदा वाले राज्यों के राजस्व अधिकारों को कमजोर करना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने सवाल किया कि यदि केंद्र सरकार वास्तव में उद्योग और रोजगार बढ़ाना चाहती है तो खनिज बहुल झारखंड में स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और स्थानीय विकास की ठोस गारंटी क्यों नहीं दी जा रही है?

झामुमो प्रवक्ता ने कहा कि झारखंड की लड़ाई जल, जंगल, जमीन और खनिज पर जनता के अधिकार की लड़ाई है। संविधान की पांचवीं अनुसूची, आदिवासी क्षेत्रों के विशेष प्रावधानों और स्थानीय समुदायों के हितों को नजरअंदाज कर केवल उद्योगों की लागत का तर्क देना झारखंड की जमीनी वास्तविकता से मुंह मोड़ना है।

उन्होंने कहा कि पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, रामगढ़, बोकारो, धनबाद सहित राज्य के कई जिलों के आदिवासी -मुलवासियों ने खनन की कीमत चुकाई है। जमीन गई, जंगल प्रभावित हुए, पर्यावरण पर दबाव पड़ा, लेकिन स्थानीय लोगों को अपेक्षित रोजगार और विकास का लाभ नहीं मिला। ऐसे में खनिज नीति पर सवाल उठाना जनता को भड़काना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार है। बुधराम लागुरी ने मधु कोड़ा को चुनौती देते हुए कहा कि वे केवल उद्योगों की लागत और निवेश की बात न करें, बल्कि यह भी बताएं कि झारखंड को खनिज संपदा के बदले कितना वास्तविक लाभ मिल रहा है और संशोधन के बाद राज्य के राजस्व हितों पर क्या असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि झामुमो किसी उद्योग या निवेश के खिलाफ नहीं है, लेकिन झारखंड की खनिज संपदा का इस्तेमाल झारखंड के हितों को कमजोर करके नहीं किया जा सकता। राज्य में उद्योग भी चाहिए, रोजगार भी चाहिए और स्थानीय लोगों के अधिकार भी सुरक्षित रहने चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा लगातार ऐसे मुद्दों पर झारखंड की जनता को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि राज्य के हितों की रक्षा की आवाज उठाना विकास विरोधी होना है। उन्होंने कहा कि यह तर्क अब झारखंड की जनता स्वीकार नहीं करेगी।

बुधराम लागुरी ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री को राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर झारखंड के दीर्घकालिक हितों पर बोलना चाहिए। केंद्र सरकार के हर निर्णय को सही ठहराना ही राष्ट्रहित नहीं है; राज्यों के संवैधानिक अधिकारों और जनता के हितों की रक्षा करना भी राष्ट्रहित का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि झामुमो गांव-गांव जाकर जनता को एमएमडीआर संशोधन के प्रावधानों की जानकारी देगा और बताएगा कि इसका राज्य के राजस्व, खनिज नीति, रोजगार और स्थानीय हितों पर क्या संभावित प्रभाव पड़ सकता है।

अंत में बुधराम लागुरी ने कहा कि “झारखंड की धरती से निकलने वाला खनिज देश के विकास में योगदान देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि झारखंड अपने अधिकारों से समझौता कर ले। खनिज संपदा पर राज्य और स्थानीय जनता के हितों की रक्षा की लड़ाई जारी रहेगी। राजनीतिक दबाव या भ्रम फैलाने के आरोप लगाकर इस आवाज को दबाया नहीं जा सकता।”

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