रांची की ओर निकला हो भाषा का कारवां, शब्दों में सजेगी अपनी माटी की आवाज
आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा दिवस समारोह-सह-कवि संगोष्ठी में शामिल होंगे पश्चिमी सिंहभूम के साहित्यकार, कवि और भाषा प्रेमी
संतोष वर्मा
चाईबासाःरविवार की सुबह चाईबासा में एक अलग ही भावुक दृश्य देखने को मिला। हाथों में किताबें, दिल में अपनी भाषा के प्रति प्रेम और आंखों में हो समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का सपना लिए हो भाषा और साहित्य का कारवां रांची की ओर रवाना हुआ।
रांची में आयोजित होने वाले 15वें आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा दिवस समारोह-सह-कवि संगोष्ठी में भाग लेने के लिए पश्चिमी सिंहभूम के बड़ी संख्या में हो साहित्यकार, कवि, लेखक और भाषा-साहित्य प्रेमी रविवार को रांची के लिए प्रस्थान किए।
सुबह तांबो चौक पर एक भावुक माहौल था। अपने साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों को विदा करने पहुंचे आदिवासी सामाजिक संगठनों के लोगों ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। चारपहिया वाहनों में सवार होकर जब साहित्यकार रांची की ओर रवाना हुए, तो मानो चाईबासा की धरती से हो भाषा की आवाज राजधानी की ओर निकल पड़ी।
इस अवसर पर विदा करने वालों में आदिवासी हो समाज महासभा के पूर्व पदाधिकारी सुशील कुमार पुरती, आदिवासी हो समाज महासभा सेवानिवृत्त संगठन के चैतन्य कुंकल, कृष्ण चंद्र बुड़ीउली, रमय पुरती, उदय चंद्र हेंब्रम, पूर्व ग्राम मुंडा महावीर बुड़ीउली, केरसे देवगम सहित अन्य लोग शामिल थे।
रांची जाने वाले साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों में हो भाषा साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली, तिलक बारी, काशराय कुदादा, मानकी सावैयां, सुनील हेंब्रम, उदय चंद्र बोदरा, चंद्रिका कोडांकेल, रमेश सावैयां, बबलू सावैयां, सुरेंद्र पुरती और इंदू तियू, वीरसिंह बुड़ीउली, सुरेंद्र पुरती समेत टाटा कॉलेज चाईबासा के टीआरएल के छात्र-छात्राएं शामिल हैं।
ये सभी रांची के धुर्वा स्थित पुराने विधानसभा भवन के अतिथि सभागार में आयोजित हो भाषा दिवस समारोह-सह-कवि संगोष्ठी में हिस्सा लेंगे।
भाषा केवल शब्द नहीं, पहचान है
हो साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली ने बताया कि पूरे पश्चिमी सिंहभूम जिले से हो समुदाय के लेखक, कवि, साहित्यकार और भाषा प्रेमी इस आयोजन में शामिल होने के लिए रांची जा रहे हैं। हमें अपनी भाषा-साहित्य की धरोहर को संरक्षित करने की जरूरत है। भाषा केवल शब्द नही, यह हमारी पहचान भी है।
