राष्टपती के नाम जगन्नाथपुर एसडीओ को सौंपा मांग पत्र, निकाली रैली

वन संरक्षण संशोधन अधिनियम 2023 वन अधिकार अधिनियम 2006 का पूर्णरूप से एक-दूसरे का विरोधाभास है साथ ही पेसा कानून और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में प्रदत्त अधिकारों को सीमित करता है। इस संशोधन में ग्राम सभाओं का वन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को शुन्य कर देगा : बोबंगा


चाईबासा : वन संरक्षण संशोधन अधिनियम 2023 रद करने के सम्बन्ध में वन क्षेत्र में निवास करने वाले आदिवासी मूलवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों की आपत्ति आवेदन एवं सूचना का अधिकार संशोधन अधिनियम 2023 को रद करने के  की मांग को लेकर पूर्व विधायक मंगल सिंह बोबंगा के नेतृत्व में रैली निकाल किया बिरोध प्रदर्शन।बाद में राष्टपती के नाम मांग पत्र जगन्नाथपुर अनुमंडल के नवपदस्थापित अनुमंडलाधिकारी मुकेश मछुवा को मांग पत्र सौंपा गया।


इस सबंध में कहा गया कि हम वनक्षेत्र में निवास करने वाले आदिवासी-मूलवासी आपका ध्यान हाल में संसद के दोनों सदनों से पारित वन संरक्षण संशोधन अधिनियम 2023 की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहेगें। यह संशोधन पूर्व के वन संरक्षण के अधिनियम में दिये गये, संरक्षण के अच्छे प्रावधनों को कमजोर करता है। यह संशोधन ग्रामसभा वन क्षेत्र में जल, जंगल, जमीन पर अधिकारों को प्रभावित करते हुए, वनों के हस्तान्तरण को आसान कर देता है।

वन संरक्षण संशोधन अधिनियम 2023 वन अधिकार अधिनियम 2006 का पूर्णरूप से एक-दूसरे का विरोधाभास है साथ ही पेसा कानून और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में प्रदत्त अधिकारों को सीमित करता है। 


इस संशोधन में ग्राम सभाओं का वन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को शुन्य कर देगा। अब सरकार ग्राम सभाओं के असहमति के दाबजूद वनों को गैर वन कार्यों एवं परियोजनाओं, साथ ही औद्योगिक परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल करने का रास्त खुल जायेगा, इस संशोधन में वनों को भूमि बैंक में स्वतः तब्दील होने की सम्भवना है। यह तो स्पष्ट है कि वनों पर आश्रित लाखों आदिवासी-मूलवासियों पर विस्थापन होने की खतरा है। यह संशोधन राज्य सरकार के निर्णय क्षेत्र को सीमित करता है एवं केन्द्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में विस्तार करता है, अब केन्द्र सरकार जब चाहे तब गैर वन कार्यों और विभिन्न परियोजनाओं के लिये बिना ग्राम सभा के बिना अनापति के वनों के जमीन को देशी-विदेशी औद्योगिक घरानों के हवाले करने की इरादा दिख रहा है।


यह काफी गम्भीर चिंतनीय विषय है कि इस संशोधन का अनुसूचित जनजाति राष्ट्रीय आयोग शुरू से ही विरोध कर चुकी है, साथ ही विपक्षी दलों ने भी इस संशोधन का विरोध किया है, वाबजूद इसके इस संशोधन को जबरन मात्र 20 (बीस) मिनट में राज्यसभा से पारित करना, प्रमाणित करता है कि केन्द्र सरकार आदिवासी-मूलवासियों की कोई चिन्ता नहीं है और इनके जल, जंगल, जमीन को देशी-विदेशी पूंजीपतियों को सौंपने की जल्दबाजी की है।


सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 देश के करोड़ों लोगों को सूचना प्राप्त करने और सरकार को जबाबदेही ठहराने का अधिकार दिया है इसके अनुसार सूचना आयोग अन्तिम अपीलय प्राधिकरण है लेकिन अब सरकार ने इन अधिनियमों पर भी संशोधन करते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का रुशोधन करते हुए सरकार की जवाबदेही को कमजोर किया।

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