चाईबासा से 25 किमी दूर बीहड़ों में बसा है जोजोहातु


जहां सरकारी उपेक्षा के बीच नक्सलियों की चलती है हुकूमत


 चाईबासा ( संतोष वर्मा ) :  नक्सल प्रभावित जोजोहातु गांव इन दिनों चर्चा में है। सीआरपीएफ 197 बटालियन के एक जवान द्वारा इस गांव में एक नाबालिक लड़की के साथ दुष्कर्म के प्रयास की घटना के बाद जोजोहातु अचानक चर्चा में आ गया। करीब 700 की आबादी वाला जोजोहातु पहाड़ी जंगलों तथा बीहड़ों के बीच बसा एक आदिवासी गांव है। गांव की बदहाली पाषाणकाल की याद दिलाती है। पर्याप्त मूलभूत सुविधाएं यहां ग्रामीणों को मयस्सर नहीं है। पेयजल की समस्या यहां दशकों पुरानी की समस्या है। अधिकत्तर ग्रामीण निरक्षर हैं। कुआं तथा चूआं का दूषित पानी पीने को विवश हैं। सरकारी चापाकल अपर्याप्त है। इनमें से भी अधिकतर चापाकल इस गरमी में खराब पड़े हैं। लेकिन मरम्मत करवाने वाला कोई नहीं है।

विकास से वंचित है जोजोहातु : ग्राम मुंडा


जोजोहातु के ग्राम मुंडा जॉर्ज तुबिड का कहना है कि हमारा गांव विकास से कोसों दूर है। रोजगार के साधन व स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं है। कोई बीमार पड़ता है, तो उसे सीधे चारपहिया वाहन लादकर 25 किमी दूर चाईबासा शहर ले जाना पड़ता है। गांव कई टोलों में विभाजित हैं। लेकिन उनको आपस में जोड़ने के लिये सड़क ही नहीं है। ऐसे में खेतों की पगडंडी ही उनका सहारा है। लेकिन बरसात में ये पगडंडी जलमग्न होकर खो जाती हैं। परिणामस्वरूप ये सारे टोले टापू बन जाते हैं। कई ग्रामीण राशन कार्ड से भी महरूम है। कुछ का नाम राशन कार्ड से काट दिया गया।

आयुष्मान कार्ड क्या हैं ग्रामीणों को पता नहीं


आयुष्मान कार्ड क्या हैं? ग्रामीणों को पता तक नहीं है। कार्ड के अभाव में वे फ्री इलाज की सुविधा से भी वंचित हैं। गर्भवती महिला, किशोरी, धात्री, प्रसूता महिलाएं को नियमित पोषाहार नसीब नहीं है। कभी मिलता है तो कभी नहीं। सरकारी आवास की सुविधा तो मानो यहां दिवास्वप्न है। किसी के पास सरकारी आवास नहीं है। सरकार की तरफ से दशकों पूर्व यहां कई इंदिरा आवास बने थे। लेकिन सारे अधूरे रह गये। सभी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गये। गांव में एक प्राथमिक विद्यालय है। लेकिन इसके अधिकतर कमरों को सीआरपीएफ कैंप बना दिया गया है। रोजगार के अभाव में अधिकत्तर युवक दूसरे राज्यों में कमाने जाते हैं। गुजरात, पंजाब, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, ओड़िशा, महाराष्ट्र में मजदूरी करते हैं। जबकि बाकी लोग जंगल से जलावन लकड़ी काटकर उसे शहरों में बेचकर जीविका चलाते हैं। कुछ परिवार बकरी, मुर्गी, बत्तख पालकर गुजारा करते हैं। मनरेगा योजनाओं में मजदूरी का भुगतान समय पर नहीं होता है। इस कारण इसमें काम करने की इच्छा किसी ग्रामीण की नहीं है। ग्रामीण आज भी घास-फूस तथा मिट्टी के खपरैल मकानों में ही रहने को अभिशप्त हैं। ग्रामीण बताते हैं कि गांव में न तो जनप्रतिनिधि आते हैं और ना ही अधिकारी। मेरा गांव प्रशासनिक दृष्टि से पूर्णत: उपेक्षित है। हालांकि ग्रामीण मानते हैं कि इसके पीछे इलाके की भौगोलिक बनावट भी जिम्मेदार है। पूरा इलाका दुरूह और ऊंची-नीची पहाड़ियों एवं घाटियों से भरा हुआ है। जहां आधारभूत संरचना का निर्माण बेहद मुश्किल है। 

इलाके में चलती है नक्सलियों की हुकूमत

चारों ओर पहाड़ों से घिरे जोजोहातु तथा उसके आसपास के इलाके में सरकार की हुकूमत कम और नक्सलियों की हुकूमत अधिक चलती है। नक्सली आसपास के इलाकों में जैसे बरकेला, कुईड़ा व अन्य गांवों में नक्सली वारदातों को अंजाम दे चुके हैं। कुछ वर्ष पूर्व चुनाव के दौरान एक चुनावी प्रचार वाहन नक्सली घटना की भेंट चढ़ गया था। जोजोहातु तथा बरकेला के बीच कुछ वर्ष पहले नक्सलियों ने मुख्य सड़क की पुलिया भी उड़ायी थी। वहीं बरकेला में एक भवन को विस्फोट से उड़ा दिया गया था। हालांकि पूरे इलाके में नक्सलियों से निपटने के लिये कई कैंप स्थापित किये गये हैं। घने जंगलों के बीच जोजोहातु को बरकेला से जोड़नेवाली सड़क के किनारे भी जगह जगह हथियारबंद जवान तैनात रहते हैं। फिर भी नक्सली यहां जब चाहे तब घटना को अंजाम देकर निकल जाते हैं। इस इलाके में दिन में जवानों की गश्ती भी होती है। पास के गांव आंजेडबेड़ा भी नक्सल प्रभावित है। सीआरपीएफ का पहरा वहां भी है। एक वर्ष पहले यहां भी सीआरपीएफ जवानों द्वारा ग्रामीणों को लाठी-डंडे से पीटे जाने की खबर सामने आयी थी। मुफ्फसिल थाने तक इसकी शिकायत पहुंची थी। इस इलाके के ग्रामीण नक्सलवाद पर बोलने से न केवल कतराते हैं, बल्कि अधिकतर लोग तो साफ मना ही कर देते हैं। हालांकि वे दबी जुबान स्वीकारते भी हैं कि इलाके के विकास में नक्सलवाद एक रूकावट है। जिला प्रशासन को नक्सल प्रभावित गांवों के सर्वांगीण विकास पर समुचित ध्यान देने की आवश्यकता है।

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