चाईबासा ( संतोष वर्मा ) : रोजा एक पवित्र इबादत है। ये विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत इबादत है।रोजा हर धर्म के लोग किसी न किसी रूप में रखते है खाना पीना और गलत काम त्याग कर तपस्या करने का नाम ही रोजा है। सनातन धर्म हो इस्लाम धर्म, ईसाई यहूदी, बोध , जैन, पारसी सबो में किसी न किसी रूप में रोजा रखने का चलन है। सनातन धर्म और इस्लाम धर्म मे रोजा या उपवास की बड़ी महत्ता है। रोजा रखने के पीछे धार्मिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक कारण है।
रोजा तप, धैर्य और समर्पण का नाम है।
रोजा गुनाहों से रुकने का नाम है।
रोजा रखने में एक मात्र लक्ष अपने ईश्वर को खुश करना है। आदि काल से जब कोई विपत्ति आती, कोई परीक्षा, युद्ध, महामारी होती तो लोग उपवास रख कर ईश्वर से प्रार्थना करते थे। लोग मन्नत मांगने और यज्ञ तपस्या मे भी उपवास रखते थे। काफी खुशी मिलने या मन चाहा मुराद पूरी होने पर भी लोग रोजा रख कर ईश्वर को धन्यवाद देते थे।रोजा मन की शांति के लिए टॉनिक से कम नहीं। जब मन विचलित होता ध्यान भटकता तो लोग अपने मन को केंद्रित करने, एकाग्रता बनाने के लिए भी रोजा रखते थे।
रमजान के रोजे रखने के पीछे भी मकसद है लोगो को नेक बनाना।
पवित्र क़ुरआन में अल्लाह फरमाता है। ए ईमान वालो हमने तुम पर रमज़ान के रोजे फ़र्ज़ किय जैसा कि तुम से पहले की उम्मतों में फ़र्ज़ किया था ताकि तुम मुत्तकी बन जाओ।इस से पता चला है हर कौम उम्मत में रोजा फ़र्ज़ किया गया है। मुत्तकी बनने का अर्थ, नेक,बुराई से पाक साफ,पवित्र मन व पवित्र आत्मा से है।अल्लाह फरमाता है बन्दे ने रोजा मेरे लिए रखा है और मै ही इसका बदला दूंगा। रोजा हर धर्म का पाक साफ और श्रेष्ठ इबादत है।इस से ईश्वर की निकटता प्राप्त होती है। लोग अधिक संतुष्ट होते है तन मन पवित्र होता है।
