रांची में हो कवियों ने मनाया द्वितीय राजभाषा दिवस

 रांची में हो कवियों ने मनाया द्वितीय राजभाषा दिवस



रसपूर्ण कविताओं से सजी कवि संगोष्ठी, तीन साहित्यिक पुस्तकों का हुआ विमोचन



संतोष वर्मा

चाईबासा। झारखंड में रविवार को आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा दिवस-सह-कवि संगोष्ठी समारोहपूर्वक मनायी गयी। रांची में आयोजित इस कार्यक्रम में हो भाषा के कवियों, साहित्यकारों, लेखकों और भाषा प्रेमियों ने अपनी मातृभाषा के संरक्षण, संवर्धन और साहित्यिक विकास का संकल्प लिया। समारोह के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कवि सूर्या सिंह बेसरा थे।

कार्यक्रम की शुरुआत हो भाषा की वारंग क्षिति लिपि के सृजनकर्ता ओतगुरू लाको बोदरा की तस्वीर के समक्ष अतिथियों द्वारा अगरबत्ती जलाकर की गयी। मुख्य अतिथि सूर्या सिंह बेसरा ने कहा कि जिस भाषा की अपनी लिपि नहीं होती, उसके साहित्य का अपेक्षित विकास संभव नहीं है। झारखंड सरकार ने वर्ष 2011 में हो भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया, लेकिन कवियों, साहित्यकारों और लेखकों की संख्या अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ने के कारण हो साहित्य को अभी और गति देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हो समाज के लेखकों और युवा साहित्यकारों को आगे आकर भाषा और साहित्य के विकास में योगदान देना चाहिए। उन्होंने लाको बोदरा के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने हो भाषा के लिए लिपि का सृजन कर ऐतिहासिक और महान कार्य किया। उनके योगदान को हो समाज को सदैव स्मरण रखना चाहिए।हो साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली ने हो भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए हुए आंदोलन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हो भाषा के कवियों, लेखकों और साहित्यकारों के सामूहिक संघर्ष और आंदोलन के परिणामस्वरूप भाषा को संवैधानिक सम्मान मिला। इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता सुषमा बुड़ीउली, रमेश सावैयां और शांति सावैयां ने भी अपने विचार रखे।

तीन साहित्यिक पुस्तकों का विमोचन

कार्यक्रम के दौरान हो भाषा में लिखी तीन साहित्यिक पुस्तकों का मुख्य अतिथि सूर्या सिंह बेसरा सहित अन्य अतिथियों ने विमोचन किया। इनमें ‘कोरं’ पत्रिका, ‘कोल्हान में हो भाषा की दावेदारी’ का अंग्रेजी अनुवाद तथा ‘हो भाषा पत्रकारिता : सरजोम उम्बुल’ पुस्तक शामिल हैं। पुस्तकों के विमोचन को हो भाषा के साहित्यिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया।

कविताओं ने बांधा समां

कवि संगोष्ठी में हो और अंग्रेजी भाषा के कवियों ने अपनी रसपूर्ण और भावपूर्ण कविताएं प्रस्तुत कर श्रोताओं की खूब तालियां बटोरीं। कविता पाठ करने वालों में चंद्रिका कोडांकेल, काशराय कुदादा, तिलक बारी, रमेश सावैयां, युगल किशोर पिंगुवा और सुनीता कुंटिया शामिल थीं। सुनीता कुंटिया ने अंग्रेजी कविता प्रस्तुत की।

कार्यक्रम में टाटा कॉलेज टीआरएल के विद्यार्थियों ने हो सांस्कृतिक गीत प्रस्तुत किया। इसके बाद नगाड़ा और मांदर की थाप पर सामूहिक नृत्य ने कार्यक्रम में आदिवासी संस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी।समारोह में मानकी सावैयां, वीरसिंह बुड़ीउली, सुरेंद्र पुरती, सोनी बोयपाई, प्रीति देवगम, बागुन बोदरा, सुरेंद्र बुड़ीउली, विश्वनाथ जारिका, सुदर्शन सिंकू, दुर्योधन मुंदूइया, गुरुचरण सिंकू, श्रीराम हेंब्रम, सुनील हेंब्रम, उदय चंद्र बोदरा, यदूनाथ तियू समेत बड़ी संख्या में साहित्यकार, भाषा प्रेमी और समाज के लोग मौजूद थे।

Post a Comment

Do live your Comments here! 👇

Previous Post Next Post